डॉ. अंकुर प्रकाश गुप्ता “मानव”, चार्टर्ड फेलो मेंबर, सेंट्रल क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी (साउथ अफ्रीका), ई–मेल: drankurprakashguptamanav@gmail.com, फ़ोन नंबर : 7017299630/8791536091/8282824022
सारांश
भारतीय समाज में मृत्यु को जीवन का स्वाभाविक सत्य माना जाता है। तेरहवीं का संस्कार शोक अवधि की समाप्ति और समाज में पुनः जुड़ने काप्रतीक है। पहले मृत्यु-भोज का उद्देश्य लोगों को एक साथ बैठाकर शोक संतप्त परिवार को सहारा देना और आपसी सहयोग की भावना कोमजबूत करना था। समय के साथ, खासकर शहरी क्षेत्रों में, यह परंपरा कई जगह दिखावे और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ गई है। इसके कारणकई परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है, विशेषकर निम्न आय वर्ग पर।
यह अध्ययन मृत्यु-भोज की पृष्ठभूमि, वर्तमान स्वरूप और उसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को समझने का प्रयास करता है। शोध में पुस्तकों, लेखों, रिपोर्टों और कुछ उदाहरणों का सहारा लिया गया है। अध्ययन से पता चलता है कि अत्यधिक खर्च पर आधारित आयोजन कई बारपरिवार को कर्ज की स्थिति में पहुँचा देते हैं। इसके स्थान पर रक्तदान, गरीब छात्रों की सहायता या वृक्षारोपण जैसे कार्य परंपरा की मूल भावना—सेवा और संवेदना—को अधिक सार्थक रूप में आगे बढ़ा सकते हैं।
Keywords: मृत्यु-भोज, सांस्कृति, भारतीय समाज, परंपरा
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